तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही, समुझि परइ जस कारन मोहि !
जब जब होइ धरम कै हानी, बाढ़इ असुर अधम अभिमानी !!
करहिं अनीति जाय नहिं बरनी, सीदहिं बिप्र-धेनु-सुर-धरनी !
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा !!
शिव जी बोले जब जब धर्म की हानि होती है और पापी, घमंडी दैत्य बढ़ते हैं, अनीति करते हैं
जो कही नहीं जा सकती उस समय ब्राह्मण, गाय, पृथ्वी और देवता दुखी होते हैं,
तब तब कृपानिधान प्रभु श्री रामचंद्र जी नाना प्रकार के शरीर
धारण करके सज्जनों की पीड़ा दूर करते हैं !
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