दो : - असुर मारि थापहिं सुरन्ह, राखहिं निज स्तुति सेतु !
जग बिस्तारहिं विसद जस, राम जन्म कर हेतु !!
राम जी असुरों का सर्वनाश और वेद की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं !
रामचन्द्र जी के जन्म का कारण यही है !
A Dedicated Blog to Depict Shri Ram Chandra Ramayan Written by Goswami Tulsidas Ji & Shalokas in Hindi
दो : - असुर मारि थापहिं सुरन्ह, राखहिं निज स्तुति सेतु !
जग बिस्तारहिं विसद जस, राम जन्म कर हेतु !!
राम जी असुरों का सर्वनाश और वेद की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं !
रामचन्द्र जी के जन्म का कारण यही है !
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही, समुझि परइ जस कारन मोहि !
जब जब होइ धरम कै हानी, बाढ़इ असुर अधम अभिमानी !!
करहिं अनीति जाय नहिं बरनी, सीदहिं बिप्र-धेनु-सुर-धरनी !
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा !!
शिव जी बोले जब जब धर्म की हानि होती है और पापी, घमंडी दैत्य बढ़ते हैं, अनीति करते हैं
जो कही नहीं जा सकती उस समय ब्राह्मण, गाय, पृथ्वी और देवता दुखी होते हैं,
तब तब कृपानिधान प्रभु श्री रामचंद्र जी नाना प्रकार के शरीर
धारण करके सज्जनों की पीड़ा दूर करते हैं !
राम अतकय बुद्धि मन बानी, मत हमार अस सुनहिं सयानी !
तदपि सन्त मुनि बेद पुराना, जस कछु कहहिं सुमति अनुमाना !!
शिव जी बोले पार्वती सुनो हमारा सिद्धांत तो ये है कि बुद्धि, मन और वाणी से रामचन्द्र जी
के बारे में तर्क कभी नहीं करना चाहिए ! इसलिए अपने मत अनुसार प्रभु की महिमा कहता हूँ !
चौ : - सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाये, बिपुल बिसद निगमागम गाये !
हरि अवतार हेतु जेहि होई, इदमित्थ केहि जाइ न सोई !!
शिव जी बोले हे गिरिजा ! सुनो, भगवान के सुन्दर विशाल निर्मल चरित्र वेद और शास्त्रों ने गान किया है !
ईश्वर का अवतार जिस कारण होता है, वह नहीं कहा जा सकता कि ये ऐसा ही है
अर्थात असंख्यों कारण एकत्र होने पर परमात्मा का अवतार होता है !
हरि गुन नाम अपार, कथा रूप अगनित अमित !
मैं निज मति अनुसार, कहऊँ उमा सादर सुनहु !!
शिव जी बोले भगवान के गुन और नाम अपार हैं, उनकी कथा का रूप अपरिमित और अनन्त है !
हे उमा ! मैं अपनी बुद्धि अनुसार कहता हूँ ! तुम आदर पूर्वक सुनो !
सो सम्बाद उदार, जेहि बिधि भा आगे कहब !
सुनहु राम अवतार, चरित परम सुन्दर अनघ !!
शिव जी बोले वह श्रेष्ठ संवाद जिस तरह हुआ वह मैं आगे कहूंगा !
पहले रामचन्द्र जी के जन्म का अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनो !
हरि गुन नाम अपार, कथा रूप अगनित अमित !
मैं निज मति अनुसार, कहहूँ उमा सादर सुनहु !!
जय श्री राम !
सो : - सुन सुभ कथा भवानि, रामचरतिमानस बिमल !
कहा भुसण्डी बखानी, सुना बिहग नायक गरुड़ !!
हे भवानी तुम कल्याणकारी रामचरित्रमानस की निर्मल कथा सुनो,
इस कथा को कागभुषण्डि ने कहा और पक्षीराज गरुड़ ने सुना था !
दो : - हिय हरषे कामारि तब, संकर सहज सुजान !
बहु विधि उमहिं प्रसंसि पुनि, बोले कृपानिधान !!
पार्वती जी की राम जी के प्रति प्रीति जान कामदेव के शत्रु शंकर जी ह्रदय में प्रसन्न हो कर बोले !
नाथ धरेउ नर तनु केहि हेतू, मोहि समुझाउ कहहु वृषकेतु !
उमा वचन सुनि परम बिनीता, राम कथा पर प्रीति पुनीता !!
पार्वती जी ने पूछा शिव जी से कि आप धर्म की पताका हैं , मुझे समझा कर कहिये राम जी ने किस कारण से मनुष्य का शरीर धारण किया हैं ! पार्वती जी के नम्र वचन सुनकर शिव जी ने जान लिया के पार्वती जी की श्री राम पर पवित्र प्रीति है !
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहु, जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू !
राम ब्रह्म चिन्मय अबिनासी, सर्ब रहित सब उर पुर वासी !!
पार्वती जी बोली यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैंने जो पहले पुछा उसे कहिये ! रामचंद्र जी तो ब्रह्म, ज्ञानमय, अविनासी सब से अलग और सब के ह्रदय रूपी नगर में निवास करने वाले हैं !
नाथ कृपा अब गयउ विषादा, सुखी भयउँ प्रभु चरण प्रसादा !
अब मोहि आपनि किंकरी जानी, जदपि सहज जड़नारी अयानी !!
हे नाथ ! अब आपकी कृपा से मेरा सारा संदेह चला गया है और मैं आपके चरणों के प्रसाद से सुखी हुईं हूँ ! अब मुझको अपनी दासी जान कर दया कीजिये !
चौ : - ससि कर सम सुन गिरा तुम्हारी, मिटा मोह सरदात प भारी !
तुम्ह कृपाल मम संसय हरेऊ, राम सरूप जानि मोहि परेउ !!
पार्वती जी शिव जी से बोलीं चन्द्रमा की किरणों के समान आप की वाणी को सुनकर मेरा अज्ञान रुपी शरदऋतु का भारी ताप मिट गया है ! आपने मेरे संदेह को हर लिया है और अब मुझे श्री रघुनाथ जी का सत्य स्वरुप जान पड़ा है !
दो : पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि, जोरि पंकरहु पानि !
बोली गिरिजा वचन बर, मनहुँ प्रेम रस सानि !
पार्वती जी बार बार शिव जी के चरणों को पकड़ कर बोलीं अब मैं रघुनाथ जी की
अलौकिक शक्ति, महिमा और गुण का रसपान करती हूँ !
सुन सिव के भ्रम भंजन वचना, मिटि गई सब कुतरक के रचना !
भय रघुपति पद प्रीति प्रतीती, दारुन असम्भावना बीती !!
शिव जी के भ्रम नाशक वचनों को सुनकर पार्वती जी के सब कुतरक समाप्त हो गए और रघुनाथ जी ही परमात्मा हैं ये परम विश्वाश हो गया और श्री राम जी के चरणों में विश्वाश एवं प्रीति हो गयी !
राम सो परमात्मा भवानी, तहँ भ्रम अति अबिहित तब बानी !
अस संसय आनत उर माहीं, ज्ञान बिराग सकल गुन जाहीं!!
शिव जी बोले हे भवानी ! रामचंद्र ही परमात्मा है उनके विषय में तुम्हारे वचन अनुचित है ! श्री राम के प्रति संदेह मन में लाते ही ज्ञान, वैराग्य और सम्पूर्ण गुण नष्ट हो जाते हैं !
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं, जनम अनेक रचित अघ दहहीं !
सादर सुमिरन जे नर करहीं, भाव भारिधि गो पद इव तरहीं !!
जो मनुष्य प्रभु श्री राम का नाम सादर प्रेम से या विवश हो कर भी लेते है उनके अनेक जन्मों के पाप प्रभु प्रताप से गाय के खुर के सामान छोटे हो कर नष्ट हो जाते हैं !
चौ : कासी मरत जन्तु अवलोकी, जासु नाम बल करउँ बिसोकी !
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी, रघुबर सब उर अन्तरजामी !!
शिव जी बोले काशी में जीवों को मरते देख कर जिन प्रभु श्री राम के नाम के बल से मैं उन्हें शोक रहित कर देता हूँ ! वही जड़ चेतन के स्वामी, सब के ह्रदय की बात जानने वाले प्रभु रघुनाथ जी हैं !
दो : - जेहि इमि गाँवहिं वेद बुध,जाहि धरहिं मुनि ध्यान !
सोइ दसरथ-सुत भगत-हित, कोसलपति भगवान !!
जिनको वेद और विद्वान् मुनि ध्यान करते हैं वही दशरथ के पुत्र भक्तों के हितकारी अयोध्या के राजा भगवान हैं !